शरद के कुछ गीत, कुछ स्मृतियाँ सतपुड़ा के जंगलों की, और वक्त से कुछ शिकायतें . . .

DSC02545 - Copyअपने बगीचे में आज सुबह हरसिंगार के सफ़ेद फूल बटोरते हुए एहसास हुआ, वक्त कितनी तेज़ी से आगे बढ़ जाता है. एक बार फिर मेरा घर-आँगन शरद के एहसास से भरा हुआ है. शरद की खुशबुएँ, शरद के रंग, शरद का नीला आकाश, शरद की मुलायम धूप, शरद की खनकती खामोशी और शरद की रातें . . . कितने गहरे से शरद महसूस होता है. शरद ऋतु का हर साल कितनी बेसब्री से इंतज़ार करती हूँ मैं. शरद के साथ जीवन की कुछ सबसे प्यारी स्मृतियाँ भी तो जुड़ी हैं – सबसे प्यारी “ऑटम वेकेशंस”, यानी नवरात्र की दो हफ्ते की छुट्टी, नानी का घर, शरद पूर्णिमा में नहाई एक नदी, कुछ सबसे प्यारे सफ़र और यात्राएं, शरद के आकाश को देखते हुए देखे दूर देशों के कुछ दिवा-स्वप्न, और जीवन के मेरे पहले वसन्त की कुछ झिलमिल स्मृतियाँ.

DSC05542मेरे छोटे से घर-आँगन में शरद के ठिकाने तय रहते हैं – जहाँ आकार हर साल वह अपना सफ़र-बैग उतारता है, जहाँ बैठ वह शरद-गीत गाता है, जहाँ वह सुबह धूप के रेशम से चद्दर काढ़ता है और और जहाँ रात तारों-सितारों, जूही और शिउली के फूलों से बतियाता है, शरद के उन सभी ठौर-ठिकानों से छेड़छाड़ प्रतिबंधित है. वह इस घर का सदस्य है.DSC05540

आज सुबह बगीचे में घूमते—भटकते देखा, स्मृतियों के फूल फिर खिलने को हैं. दो साल पहले का शरद की यादे हैं वे कलियाँ – जिन्हें मैं दूर देश से साथ लिए चली आई थी, मेरे साथ रहने के लिए. उन्हें छूते ही लगता है जैसे वक्त को छू लिया हो, दूर देस की उस मिटटी को छू लिया हो.2014-10-06 08.26.31  

घने जंगली सालों के लम्बे पेड़ों के बीच एक सूनी काली सड़क, उस सड़क के किनारे एक घने पेड़ के नीचे मील की एक पुराना पत्थर. एक अलसायी दोपहर, उस पत्थर पर बैठ कर एक वीरान जंगल के शरद-गीत सुने थे मैंने. अकेले भटकते बहुत दूर निकल गयी थी मैं. सामने आसमान तक उठती पहाड़ियां थीं सतपुड़ा की – लाखों सालों से वैसे ही खामोश बैठी, जिनमें हर साल शरद अपने सबसे सुन्दर गीत गाता है.

DSC04896उस जंगल का एक टुकड़ा मैं उन जंगलों से मांग लायी थी. कहीं बहुत पीछे छूट गया वह वक्त शायद फिर कभी मिले. पर वक्त का क्या है, और इस जीवन का क्या, जो इन कालजयी गीतों के आगे कितना छोटा है.2012-10-19 13.35.13 जीवन जीने की यह अथाह प्यास, इन गीतों को हज़ारों, लाखों बार, बार-बार सुनाने की प्यास हर बार जब उन्हें सुनती हूँ तो बढ़ जाती है. और मन दुःख से भर उठाता है, दुःख वक्त के बहे चले जाने का, दुःख एक जीवन के सबसे सुन्दर दिन बीत जाने का, दुःख उन तक वापस एक बार और ना लौट पाने का.

 PRIYADARSHINI POINT