और एक तपती दुपहरी बादल कुछ यूं आये मेरे शहर

एक अंधियारी दुपहरी . . .

मेरे सूने आँगन में आज हँसी गूँज उठी

सुबह खिलने से ठीक पहले इन्हें देखा एक खूबसूरत दिन का वादा मुझसे करते हुए.Image Image

और झूटा नहीं था वो.वादा.

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जब मालती महकती है मेरे घर…

जब मालती महकती है मेरे घर...

काली-काली घटाएं जब घेर लेती हैं आकाश और रह-रह कर बादलों के राग से धरती थर्रा उठाती है मालती महकती है मेरे घर. . .

बादल आ गए . . .

बादल आ गए . . .

इन ‘काली-कजरारी’ घटाओं को यूं उमड़ते-घुमड़ते आज की अंधियारी सुबह देखा और गन्धर्व यद आये, मेघों जैसे गहन-गंभीर स्वर में कहते “अवधूता . . . गगन घटा गहरायी . . . हो. . . ” और मन भर आया.